Tuesday, December 11, 2012

वो सर्दी की धूप

बात तब की है जब मेरी उम्र सात साल रही होगी। हम जहाँ रहते थे वहाँ आस-पास में कई घर थे — बिल्कुल सटे सटे। मेरे घर के ठीक पड़ोस में मेरी बुआ की सहेली का घर था। हमारा उस घर में आना जाना लगा रहता था। अक्सर शाम में मैं और मेरी बुआ उनके घर जाते थे और मजे से कैरम और लूडो खेलते थे। डॉली नाम था उनका साथ ही उनकी एक बहन थी - गुड्डी। दोनों बहनों का असली नाम तो पता नहीं पर सब उन्हें यही बुलाते थे। उस समय दोनों बहनें कुँवारी थीं। गुड्डी बड़ी बहन थी और डॉली छोटी, दोनों बहनें मेरी मंझली और छोटी बुआ के साथ एक ही कॉलेज में पढ़ती थीं। दोनो स्वभाव से बहुत ही हँसमुख और मिलनसार थीं और खूब गप्पें लड़ाती थीं। उनके साथ मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि वे दोनों मेरी बुआ नहीं बल्कि उनकी सहेलियाँ हैं। हम सब अक्सर शाम में बगल के बगीचे में बॅडमिंटन खेला करते थे। पर असली मजा तो जाड़े के मौसम में आता था….. हम क्रिसमस की छुट्टियों में, जब स्कूल बंद रहता था उनके छत पर मजे से धूप सेकते थे। वहीं पर बगल में बैठकर मेरी दादी और गुड्डी बुआ की माँ सलाई पर स्वेटर बुनने के लिए घर चढ़ाया करती थीं। वैसे मुझे स्वेटर बुनना तो नहीं आता था पर उनका सलाई चलाना बहुत पसंद आता था। जब उन्हे आभास हुआ कि मुझे भी सलाई पर स्वेटर बुनने का मन करता है, तो दादी ने मुझे भी एक सलाई पर कुछ घर चढ़ाकर दे दिया बुनने के लिए। और फिर तो मुझे मन माँगी मुराद मिल गई। उसके बाद तो मैं छत के एक कोने में जाकर कुछ बेतरतीब सा बुनने लगी। उधर दूसरी ओर मेरी दादी, बुआ और उनकी सहेलियाँ मुझे देख देखकर मुस्कुरा रही थीं। पर घंटे भर बाद ही मेरा मन ऊब गया और मैं फिर मुंडेर से गली में झाँकने लगी। और मेरी बुआ और बाकी लोग धूप सेंकने में व्यस्त हो गये। थोड़ी देर बाद ही मैं भागते हुए वापस आकर उनके पास बैठ गई। पर आखिर कुछ दिनों में मुझे भी बुनना आ गया। और पहली बार मैंने अपनी गुड़िया का स्वेटर बुना! इस तरह दिसंबर की सर्दी की वो गुनगुनी धूप यादगार बन गई। आज उस घटना को सोलह बरस बीत गये पर वो मानस-पटल पर आज जीवंत है।


4 comments:

  1. आपका यह पोस्ट अच्छा लगा। मेरे नए पोस्ट पर आपकी प्रतिक्रिया की आतुरता से प्रतीक्षा रहेगी। धन्यवाद।

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    1. आपके कमेंट के लिए बहुत धन्यवाद।

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    1. धन्यवाद। अगर पोस्ट पसंद आया तो कृपया फॉलो करें।

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