Wednesday, December 19, 2012

मत आना दुनिया में बेटी

(यह कविता उन सभी लड़कियों के लिए है जिन्होने अपने जीवन में किसी तरह के अत्याचार सहे और/या उनका बहादुरी से सामना किया।)

मत आना तू दुनिया में बेटी,
कि यहाँ हर तरफ भेड़िये भरे हैं।
तेरे जनम से पहले ही
तेरे आने की खबर से हाय-तौबा मचाए हैं।

ये चाहते ही नहीं कि तू
इस दुनिया में आये,
इसलिए ये हमेशा नई नई मशीनें
इज़ाद करते रहे हैं।

तेरे गर्भ में रहते में तेरी माँ को
सताते रहते हैं।
उसे बरगलाते डराते हैं,
तुझे मारने को कहते हैं।

तेरी दादी चाहे तेरे पापा
कोई नहीं तुझे चाहता है,
तिस पर उन्हे मुझे सताने में
बहुत मजा आता है।

पर मुझे तो तुझमें अपनी
परछाईं नजर आती है,
पर कैसे समझाऊँ दुनिया को?
उन्हे यह बात नजर नहीं आती है।

इतनी मुसीबतों के बावजूद
है आखिर तेरा जन्म हुआ,
पर इतने पर भी तेरा दर्द
नहीं अभी है खत्म हुआ।

भले ही तू अभी नवजात है,
पर वहशी राक्षसों की अनगिन
भूखी नजरें तुझपे गड़ी हैँ।
वे भेड़ियों गिद्धों की तरह
तुझे नोचना चाहते हैं।

मैं तुझे बचाने को अपनी
आँचल में छिपाये हूँ,
पर जब तू बड़ी होगी तब क्या होगा
मैं इससे और अधिक घबराई हूँ।

तुझे बड़े होने पर
इससे भी बड़े खतरे देखने हैं।
पता नहीं किस मोड़ पर
तुझे छेड़ा जाए या
तेरी  इज्जत को तार-तार
किया जाए।

इसलिए तो मैं तुझसे
बस यही कहूँगी
मत आना तू इस दुनिया में बेटी। ं

Friday, December 14, 2012

हाय ये कैसी जिन्दगी ?

कभी ये टेसू के फूलों सी
लगती है रंगीन,
कभी ये पतझड़ जैसी
हो जाती रंगहीन।

कभी लगे कि जैसे इससे
कुछ भी नहीं हसीन।

कभी कभी भीनी सुगंध सी
कभी सुस्त सी लगती,
कभी लगे बस बौराई सी
नहीं किसी से थमती।


कभी लगे जैसे बेसुध सी
कभी एकदम भाव-विभोर,
कभी-कभी बस सन्नाटे सी


नहीं कहीं भी कोई शोर।

कभी हमारे सपनों जैसी
कभी छूटती लगे ये डोर,
कभी हमारे माशूक सी
और कभी बस ना कोई जोर ।


कभी जटिल प्रश्न सी लगती
और कभी आसाँ जवाब,
कभी लगे ये शोख़ सुबह का
जैसे कोई सुहाना ख़्वाब।


है जटिल प्रश्न और लाजवाब
दे सके कौन इसका जवाब,
बस रहे सोचते हम सदा
हाय!ये कैसी जिन्दगी?








(नोट :- कलरव नाम से पहले ही कई चिट्ठे <ब्लॉग> थे अतःमैने अपने चिट्ठे का नाम कुमुदनी कर दिया। असुविधा के लिए खेद है।)

Tuesday, December 11, 2012

वो सर्दी की धूप

बात तब की है जब मेरी उम्र सात साल रही होगी। हम जहाँ रहते थे वहाँ आस-पास में कई घर थे — बिल्कुल सटे सटे। मेरे घर के ठीक पड़ोस में मेरी बुआ की सहेली का घर था। हमारा उस घर में आना जाना लगा रहता था। अक्सर शाम में मैं और मेरी बुआ उनके घर जाते थे और मजे से कैरम और लूडो खेलते थे। डॉली नाम था उनका साथ ही उनकी एक बहन थी - गुड्डी। दोनों बहनों का असली नाम तो पता नहीं पर सब उन्हें यही बुलाते थे। उस समय दोनों बहनें कुँवारी थीं। गुड्डी बड़ी बहन थी और डॉली छोटी, दोनों बहनें मेरी मंझली और छोटी बुआ के साथ एक ही कॉलेज में पढ़ती थीं। दोनो स्वभाव से बहुत ही हँसमुख और मिलनसार थीं और खूब गप्पें लड़ाती थीं। उनके साथ मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि वे दोनों मेरी बुआ नहीं बल्कि उनकी सहेलियाँ हैं। हम सब अक्सर शाम में बगल के बगीचे में बॅडमिंटन खेला करते थे। पर असली मजा तो जाड़े के मौसम में आता था….. हम क्रिसमस की छुट्टियों में, जब स्कूल बंद रहता था उनके छत पर मजे से धूप सेकते थे। वहीं पर बगल में बैठकर मेरी दादी और गुड्डी बुआ की माँ सलाई पर स्वेटर बुनने के लिए घर चढ़ाया करती थीं। वैसे मुझे स्वेटर बुनना तो नहीं आता था पर उनका सलाई चलाना बहुत पसंद आता था। जब उन्हे आभास हुआ कि मुझे भी सलाई पर स्वेटर बुनने का मन करता है, तो दादी ने मुझे भी एक सलाई पर कुछ घर चढ़ाकर दे दिया बुनने के लिए। और फिर तो मुझे मन माँगी मुराद मिल गई। उसके बाद तो मैं छत के एक कोने में जाकर कुछ बेतरतीब सा बुनने लगी। उधर दूसरी ओर मेरी दादी, बुआ और उनकी सहेलियाँ मुझे देख देखकर मुस्कुरा रही थीं। पर घंटे भर बाद ही मेरा मन ऊब गया और मैं फिर मुंडेर से गली में झाँकने लगी। और मेरी बुआ और बाकी लोग धूप सेंकने में व्यस्त हो गये। थोड़ी देर बाद ही मैं भागते हुए वापस आकर उनके पास बैठ गई। पर आखिर कुछ दिनों में मुझे भी बुनना आ गया। और पहली बार मैंने अपनी गुड़िया का स्वेटर बुना! इस तरह दिसंबर की सर्दी की वो गुनगुनी धूप यादगार बन गई। आज उस घटना को सोलह बरस बीत गये पर वो मानस-पटल पर आज जीवंत है।


Friday, December 7, 2012

कोई बात तो है

आज वो खोये खोये हैं
लगता है ,कोई बात तो है ।
कभी हँसते कभी रोये हैं
लगता है कोई बात तो है ।

कभी दिन ढले पास तो आये ,
और भोर हुए चले जाना ।
कभी दूर कभी पास से हैं ,
जैसे कोई बात तो है ।

कभी वो गुमशुम से बैठे हैं
और कभी मुस्काते हैं ,
पूछूँ तो बताते नहीं हैं
लेकिन कोई बात तो है ।

रोज रात को बैठ सिरहाने
कभी वो मीठी बात करें ,
और कभी फिर सन्नाटा सा
जैसे कोई बात तो है ।

आज फिर जब मैंने पूछा -
"क्या है ? कोई बात तो है ?"
फिर भी नहीं कहा कुछ उसने,
लेकिन कोई बात तो है ।

कई बार था मैंने पूछा ,
आखिर कोई बात तो है ।

आज सुबह थे वो गुमशुम से
पूछा तो बोले - "कुछ नहीं है ।"
लेकिन मैं तो जान चुकी थी -
आखिर कोई बात जो है ।