Monday, November 26, 2012

घंटी का रहस्य

दूर कहीं थी घंटी बजती,
रोज सुबह औ' शाम को ।
और मैं बैठी सोचा करती,
भर दोपहर रात को ॥

कि वो कहीं एक मंदिर है,
या कोई छोटा स्कूल ?
या फिर कोई जानबूझकर
मुझे चुभोता है यह शूल ?

पास नहीं, पर ज्यादा दूर
नहीं वो मेरे घर से ,
फिर भी मैं थी सोचा करती-
" पहुँचूँ वहाँ मैं कैसे ? "

कुछ न कुछ तो बात है क्योंकि
घंटी कोई बजाता है ।
नहीं तो क्या मेरे कानों को
सब यूँ ही सुनाई दे जाता है ?

वहाँ पर है एक बागीचा
ये बात तो मैं थी जानती,
फिर भी जाने क्यों मैं न थी
वहाँ पे जाना चाहती ?

कोई है मुझको बुला रहा
देकर मधुर वो आवाजें,
या ये कोई धोखा है
जिससे मैं हूँ भरमाई ?

यह मधुर स्वर मेरे कानों को
रोज सुनाई देता है
और मैं रहती हूँ सोचती
ये कौन आवाजें देता है ?

यह तो एक पहेली है ,
मेरे सन्नाटे की सहेली है ।
या कोई जादूगर बैठ वहाँ
रोज वंशी बजाता है ?