Thursday, September 20, 2012

एक अनमनी सुबह

एक डोर है मैंने बाँध रखी ,
अपने छोटे से आँगन में।
जिस पर टँगी हैं कुर्तियाँ,
कुछ लाल भी औ' कुछ नीली भी ॥

और दूर खाट पर पड़ी हुई हैं ,
रंग-बिरंगी चुन्नियाँ।
और सामने तुलसी पर
कुछ अनमनी सी तितलियाँ ॥

कि दूर बाँग दे रहा है ,
इक रंग बिरंगा वो मुर्गा।
और गली में खड़ा है चीखता,
मोटे सेठ का इक गुर्गा॥

और दूर कहीं हैं बज रहीं
मंदिर में मधुर घंटियाँ ।
और वहीं वो बच्चा
पीट रहा टीन पर डंडियाँ ॥

छत पे माँ है बतिया रही ,
अपनी उस सखी - सहेली से।
फिर वहीं कहीं बागीचे में ,
हैं दौड़ रही मेरी सखियाँ ॥

क्या भोर है देखो यह आई
मस्ती का संदेशा लाई।
और दूर कोने में पड़ी हुई ,
है रात वो लेती अंगड़ाई ॥

और पीछे की गली में
स्कूल जाते कुछ बच्चे हैं ।
जिनके पीठों पर टँगे हुए
कई रंग - बिरंगे बस्ते हैं ॥

है भीड़ तो अब बढ़ने लगी
हाट और बाजारों में ।
फिर भी न जाने क्यूं अबतक,
मैं हूँ खोई विचारों में ॥

कि देखो कैसी यह सुबह
है जो अब तो आ गई ।
और मेरे मन के आँगन को ,
है जैसे महका गई ॥

2 comments:

  1. मेरा गाँव मेरा देश ! वाह !

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपके कमेंट के लिए धन्यवाद।

      Delete

सुधि एवं विज्ञ पाठकगण अपने सुझाव अवश्य दें । आपके सुझाव व कमेंट्स बहुत कीमती हैं। किन्तु बिना पोस्ट पढ़े कमेंट न दें । कुछ रचनाएँ साभार प्रकाशित की गई हैं (जहाँ कथित हैं), तथा इनमें कोई स्वार्थ निहित नहीं है ।