Friday, September 14, 2012

बेचारी परियाँ क्या करें ?

बचपन में दादी-नानी कहानियाँ सुनाया करती थी - परियों वाली । कैसे परियाँ दुःखी गरीब लड़कियों की मदद किया करती हैं । वे आती हैं और उन्हे उनकी दुष्ट चाची या सौतेली माँ के अत्याचार से आजादी दिलाती थीं । परियाँ अंधेरी रात में आती थीं और उसकी घर के काम पूरे करने में मदद करती थीं । लेकिन यह कहानी हमेशा ऐसी नहीं रह पायी । बीतते समय के साथ मानवीय कुरीतियाँ परियों के बीच पहुँच गईं ।पर वे परियाँ थीं - अच्छाई की दूत - हार कैसे मान लेतीं ? उन्होने विरोध करना शुरु कर दिया ।बात बढ़ने लगी । एक तरफ सारे दकियानूसी नियम तो दूसरी तरफ उनकी स्वच्छंदता , क्लेश शुरु हो गया । उन्होने कहा - " हमारे पंख हैं ही हमारी आजादी के प्रतीक , आप सब हम पर ये बेकार की बंदिशें मत लादें ।" पर उनकी बात सुनने को कोई तैयार नहीं दिख रहा था । उन्होनें सोचा कि अब इस समस्या का हल सिर्फ भगवान के पास ही है , इसलिए अब उनके द्वार पर ही दस्तक देनी पड़ेगी । ये सोचकर सारी परियाँ परीलोक छोड़कर स्वर्ग की ओर चल दीं । पूरे विश्वास से वे भगवान के सामने आईं । उन्होनें पूछा - " क्या हुआ ? आज सारी परियाँ यहाँ , वो भी एक साथ । क्या समस्या आ गई ? " परियों ने जवाब दिया - " प्रभु ! हम बहुत परेशान हैं और बस आपका ही आसरा है । " भगवान ने कहा - " मुझे अपनी परेशानी विस्तार से बताओ ।" परियों ने भगवान को सारी व्यथा विस्तार से सुनाईं कि कैसे उनके साथ बुरा व्यवहार हो रहा है । " अब आप ही बताएँ प्रभु , हम क्या करें ? " परियों ने कातर स्वर में पूछा । भगवान भी बेचारे परेशान और निरूत्तर हो गये । कुछ देर सोचकर उन्होने कहा - " मैं तुम सब की परेशानी को समझता हूँ , पर मैं सचमुच लाचार हूँ । मेरे पास इसका कोई हल नहीं है । "
परियाँ सोच में पड़ गईं ।
भगवान ने आगे कहा - " मैंने तुम सब को अच्छाई फैलाने के लिए उत्पन्न किया था । मैंने यह कभी नहीं नहीं सोचा था कि आपसब ऐसी परेशानी में पड़ जाएँगीं । मेरे पास आपकी परेशानी का कोई हल नहीं है ।"

बेचारी परियाँ निरूत्तर हो कर चली गईं ।
अब वे क्या करें ? अब कोई मदद की आस भी नहीं रही ।

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