Thursday, January 10, 2013

कलमुँही

क्यों री कलमुँही कुछ बोलती क्यों नहीं? आज फिर सारा सामान तोड़ दिया! - आज मीना का दिन ही खराब था; सुबह मुनिया के बाप से झगड़ा हुआ और फिर उसकी सास ने ताना देना शुरु कर दिया। वह हर दिन सुबह से शाम तक घरों में काम किया करती थी और उसका पति पास के भट्ठे पर काम करने जाया करता था। दोनों मिलकर अपनी बेटी मुनिया यानि मानसी को पास के स्कूल में पढ़ा रहे थे।- "क्यूँ रे बोलती क्यों नहीं?" फिर से मीनू मैडम चीखी तब जाकर मीना की तंद्रा भंग  हुई।
"कुछ नहीं मैडम, वो आज मुनिया की परीक्षा का रिजल्ट आने वाला है; इसलिए मैं जल्दी काम निबटाना चाहती थी।" अच्छा तेरी बेटी तो जैसे कोई पहाड़ तोड़कर ला रही हो।" - मीनू मैडम ने उलाहना देते हुए कहा।
     बेचारी मीना अब उसकी बात अनसुनी करते हुए अपना काम करने लगी। सारा काम करके जब वो जाने लगी, तो मीनू ने उसे घूरते हुए कहा, "शाम को आकर जरा मेरी मदद कर देना।" "ठीक है, मैं आ जाऊँगी।" इतना कहकर मीना तेज-तेज कदम बढ़ाती अपने घर की तरफ चल पड़ी। मगर जैसे लगता है कि सारा दुर्भाग्य ही उसके पीछे पड़ा था; घर पहुँचते ही उसकी सास शुरू हो गई - " सुन आज जल्दी - जल्दी सारा काम निबटा, मुझे अपने गाँव जाना है।"
खैर ऐसा होना तो लगता है मीना की नियति बन गई थी। वह कुछ बोले बिना दूसरे कमरे में चली गई। उसकी बेटी ने जब माँ को कमरे में आते देखा तो दौड़कर उसके पास आई। फिर उसने अपने बस्ते में से एक लिफाफा निकाला और देते हुए बोली, "माँ, मैं अव्वल आई।" जब मीना ने लिफाफा खोला तो उसमें पाँच हजार रुपये और एक चिट्ठी थी। मीना ने पैसे एक तरफ रखे और चिट्ठी पढ़नी शुरू की - आपकी लाडली बेटी न सिर्फ अपनी क्लास में बल्कि पूरे स्कूल में सबसे अच्छे नम्बर लेकर आई है। स्कूल प्रशासन इसके अच्छे भविष्य की कामना करते हुए रु० 5000/- की स्कॉलरशिप दे रहा है; साथ ही हम इसकी आगे की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाने को तैयार है।" - मीना की मुराद पूरी हो गई। पत्र पढ़ने के बाद उसकी आँखों में खुशी को आँसू थे।

पाँच साल बाद जब मानसी ने ग्रेजुएशन की परीक्षा में टॉप करते हुए गोल्ड मेडल पाया तो उसकी माँ को लगा कि हाँ, मेरी बेटी कुछ बड़ा करेगी। बी०ए० करके मानसी ने एम० ए० में एडमिशन लिया, और मुहल्ले के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगी।
देखते-देखते समय बीतता गया और उसकी फाइनल परीक्षा शुरु हो गई। वह जी जान से दिन में ट्यूशन पढ़ाती और रात में अपनी पढ़ाई पूरी करती। इस तरह उसकी एम० ए० फाइनल की परीक्षा भी खत्म  हो गई।
परीक्षा के बाद उसने ट्यूशन बड़े पैमाने पर शुरू कर दिया। इसी तरह दिन बीतते गए और वह दिन भी आ गया जब उसका एम० ए० का भी रिजल्ट आ गया।
मानसी ने जब रिजल्ट देखा तो उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने पूरी यूनिवर्सिटी में दूसरा स्थान प्राप्त किया था। एक सप्ताह बाद जब उसका नाम विश्वविद्यालय सम्मान के लिए अखबार में आया तो उसके मुहल्ले वालों ने बधाई देने के लिए लाइन लगा दी।

कुछ दिन बाद उसने 'नेट' परीक्षा पास की और अपने ही कॉलेज में लेक्चरर बन गई।- आज मीना बहुत खुश थी; लेकिन मानसी को लग रहा था कि अब भी कुछ बाकी है। खैर अब उसे पता था कि उसे क्या करना है। उसने एक यूरोपियन यूनिवर्सिटी मे फेलोशिप के लिए आवेदन दिया जो स्वीकार हो गया। उसे वहाँ से रिसर्च के लिये 150,000 यूरो का सालाना अनुदान भी मिल रहा था। घर आकर उसने अपनी माँ को यह बात बताई तो मीना ने कहा, "अगर आज तेरे पिता होते तो वो कितने खुश होते।"
मीना की आँख में खुशी के आँसू छलक आए थे, उसने सोचा भी न था कि उसकी बेटी जो इतनी कठिनाई से पढ़ाई कर पाई थी, आज विदेश पढ़ने जा रही है।
मानसी ने जल्द ही वीज़ा और पासपोर्ट प्राप्त किया, और फिर दोनों हवाई जहाज पर सवार थे।

वहाँ यूनिवर्सिटी में पॉल एडवर्ड नाम का एक रिसर्च एसोसिएट था; जो मानसी के साथ ही रिसर्च टीम में था। रिसर्च के दौरान दोनों में दोस्ती हो गई,जो धीरे-धीरे कब प्यार में बदल गई दोनों को अहसास भी नहीं हुआ।
रिसर्च आर्टिकल छपने के बाद कई विश्वविद्यालयों ने उसे एसोसिएट प्रोफेसर नियुक्त करने के लिए सम्पर्क किया और आखिर उसने वेल्स यूनिवर्सिटी एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में ज्वाइन कर ली।

आज मीना को लग रहा था कि उसने मुनिया के लिए जो भी कष्ट उठाए थे वे सब सार्थक हो गए - आखिरकार आज उसकी बेटी वेल्स युनिवर्सिटी की प्रोफेसर थी।

एक दिन मीना बाहर लॉन में बैठी बीती बातों को याद कर रही थी कि अचानक ही उसे मीनू मैडम की बात याद आ गई - 'अच्छा तेरी बेटी तो जैसे पहाड़ तोड़कर ला रही हो।' - उसकी आँखों में गर्व और खुशी झलक रही थी; जो अब आँसू बनकर आँखों के कोरों तक आ गई थी। उसने मानसी को अपनी तरफ आते देखा तो जल्दी से आँचल से अश्रु पोंछ लिए; पर बेटी से अपने मनोभाव न छुपा सकी।
मानसी ने माँ के बगल में बैठते हुए पूछा - "नहीं मुनिया  ये बात नहीं है, बस जरा पुरानी बातों में खो गई थी।" मीना ने आँसू पोंछकर कहा। "अच्छा ये बता आज तू पहले कैसे आ गई?" - मीना ने बात पलटते हुए पूछा।
"तुझे एक खुशखबरी सुनानी थी, तो सोचा तुझे मिलकर ही बताऊँ। मैं और पॉल शादी कर रहे हैं।" - मानसी ने चहकते हुए कहा। मीना पॉल एडवर्ड के बारे में जानती थी। पॉल वेल्स में ही पैदा हुआ था और उसका परिवार यहीं रहता था। वह जानती थी कि इतने सालों में दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगे थे।

तीन दिन बाद ही मानसी और पॉल ने शादी कर ली। अब मीना का एक पूरा परिवार था - प्रोफसर बेटी और दामाद और वो। पॉल भी ट्रांसफर लेकर वेल्स आ गया था, इसलिए सब साथ ही रहते थे।

पॉल और मानसी दोनों यूनिवर्सिटी गये हुए थे। मीना अपने कमरे में बैठी सोच रही थी, कैसे कैसे ताने सुनाते थे लोग उसे और उसकी बेटी को; लेकिन आज उसकी बेटी ने सह हासिल किया अच्छा मुकाम और अच्छा पति भी। लोग आज उसे प्रोफेसर मानसी की माँ के रूप में पहचानते थे।
अब उसे कोई नहीं कहता था - कलमुँही।

Wednesday, January 2, 2013

नववर्ष से आशा

नववर्ष है नव उमंग
नव तरंग और जीवन नव।
नव आशा है नव अभिलाषा
जीवन का आनंद नव॥

नवीन स्वप्न है
और प्रश्न है
जीवन का सिद्धांत नव।

सत्य नव है,
कर्म नव और है
सारा आनंद नव।

जीवन के हैं प्रश्न नये
और सभी आनंद हैं नव।

कई उल्लास हैं
और अहसास हैं,
और कई जवाब हैं नव।

हम सब के हैं दिल में बैठे,
सुरक्षित दिनों के सपने नव।

न हो कभी इस वर्ष कहीं
किसी 'दामिनी' के साथ बुरा।
और न मिले हमें देखने को
कोई दुःस्वप्न नव ॥

Wednesday, December 19, 2012

मत आना दुनिया में बेटी

(यह कविता उन सभी लड़कियों के लिए है जिन्होने अपने जीवन में किसी तरह के अत्याचार सहे और/या उनका बहादुरी से सामना किया।)

मत आना तू दुनिया में बेटी,
कि यहाँ हर तरफ भेड़िये भरे हैं।
तेरे जनम से पहले ही
तेरे आने की खबर से हाय-तौबा मचाए हैं।

ये चाहते ही नहीं कि तू
इस दुनिया में आये,
इसलिए ये हमेशा नई नई मशीनें
इज़ाद करते रहे हैं।

तेरे गर्भ में रहते में तेरी माँ को
सताते रहते हैं।
उसे बरगलाते डराते हैं,
तुझे मारने को कहते हैं।

तेरी दादी चाहे तेरे पापा
कोई नहीं तुझे चाहता है,
तिस पर उन्हे मुझे सताने में
बहुत मजा आता है।

पर मुझे तो तुझमें अपनी
परछाईं नजर आती है,
पर कैसे समझाऊँ दुनिया को?
उन्हे यह बात नजर नहीं आती है।

इतनी मुसीबतों के बावजूद
है आखिर तेरा जन्म हुआ,
पर इतने पर भी तेरा दर्द
नहीं अभी है खत्म हुआ।

भले ही तू अभी नवजात है,
पर वहशी राक्षसों की अनगिन
भूखी नजरें तुझपे गड़ी हैँ।
वे भेड़ियों गिद्धों की तरह
तुझे नोचना चाहते हैं।

मैं तुझे बचाने को अपनी
आँचल में छिपाये हूँ,
पर जब तू बड़ी होगी तब क्या होगा
मैं इससे और अधिक घबराई हूँ।

तुझे बड़े होने पर
इससे भी बड़े खतरे देखने हैं।
पता नहीं किस मोड़ पर
तुझे छेड़ा जाए या
तेरी  इज्जत को तार-तार
किया जाए।

इसलिए तो मैं तुझसे
बस यही कहूँगी
मत आना तू इस दुनिया में बेटी। ं

Friday, December 14, 2012

हाय ये कैसी जिन्दगी ?

कभी ये टेसू के फूलों सी
लगती है रंगीन,
कभी ये पतझड़ जैसी
हो जाती रंगहीन।

कभी लगे कि जैसे इससे
कुछ भी नहीं हसीन।

कभी कभी भीनी सुगंध सी
कभी सुस्त सी लगती,
कभी लगे बस बौराई सी
नहीं किसी से थमती।


कभी लगे जैसे बेसुध सी
कभी एकदम भाव-विभोर,
कभी-कभी बस सन्नाटे सी


नहीं कहीं भी कोई शोर।

कभी हमारे सपनों जैसी
कभी छूटती लगे ये डोर,
कभी हमारे माशूक सी
और कभी बस ना कोई जोर ।


कभी जटिल प्रश्न सी लगती
और कभी आसाँ जवाब,
कभी लगे ये शोख़ सुबह का
जैसे कोई सुहाना ख़्वाब।


है जटिल प्रश्न और लाजवाब
दे सके कौन इसका जवाब,
बस रहे सोचते हम सदा
हाय!ये कैसी जिन्दगी?








(नोट :- कलरव नाम से पहले ही कई चिट्ठे <ब्लॉग> थे अतःमैने अपने चिट्ठे का नाम कुमुदनी कर दिया। असुविधा के लिए खेद है।)

Tuesday, December 11, 2012

वो सर्दी की धूप

बात तब की है जब मेरी उम्र सात साल रही होगी। हम जहाँ रहते थे वहाँ आस-पास में कई घर थे — बिल्कुल सटे सटे। मेरे घर के ठीक पड़ोस में मेरी बुआ की सहेली का घर था। हमारा उस घर में आना जाना लगा रहता था। अक्सर शाम में मैं और मेरी बुआ उनके घर जाते थे और मजे से कैरम और लूडो खेलते थे। डॉली नाम था उनका साथ ही उनकी एक बहन थी - गुड्डी। दोनों बहनों का असली नाम तो पता नहीं पर सब उन्हें यही बुलाते थे। उस समय दोनों बहनें कुँवारी थीं। गुड्डी बड़ी बहन थी और डॉली छोटी, दोनों बहनें मेरी मंझली और छोटी बुआ के साथ एक ही कॉलेज में पढ़ती थीं। दोनो स्वभाव से बहुत ही हँसमुख और मिलनसार थीं और खूब गप्पें लड़ाती थीं। उनके साथ मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि वे दोनों मेरी बुआ नहीं बल्कि उनकी सहेलियाँ हैं। हम सब अक्सर शाम में बगल के बगीचे में बॅडमिंटन खेला करते थे। पर असली मजा तो जाड़े के मौसम में आता था….. हम क्रिसमस की छुट्टियों में, जब स्कूल बंद रहता था उनके छत पर मजे से धूप सेकते थे। वहीं पर बगल में बैठकर मेरी दादी और गुड्डी बुआ की माँ सलाई पर स्वेटर बुनने के लिए घर चढ़ाया करती थीं। वैसे मुझे स्वेटर बुनना तो नहीं आता था पर उनका सलाई चलाना बहुत पसंद आता था। जब उन्हे आभास हुआ कि मुझे भी सलाई पर स्वेटर बुनने का मन करता है, तो दादी ने मुझे भी एक सलाई पर कुछ घर चढ़ाकर दे दिया बुनने के लिए। और फिर तो मुझे मन माँगी मुराद मिल गई। उसके बाद तो मैं छत के एक कोने में जाकर कुछ बेतरतीब सा बुनने लगी। उधर दूसरी ओर मेरी दादी, बुआ और उनकी सहेलियाँ मुझे देख देखकर मुस्कुरा रही थीं। पर घंटे भर बाद ही मेरा मन ऊब गया और मैं फिर मुंडेर से गली में झाँकने लगी। और मेरी बुआ और बाकी लोग धूप सेंकने में व्यस्त हो गये। थोड़ी देर बाद ही मैं भागते हुए वापस आकर उनके पास बैठ गई। पर आखिर कुछ दिनों में मुझे भी बुनना आ गया। और पहली बार मैंने अपनी गुड़िया का स्वेटर बुना! इस तरह दिसंबर की सर्दी की वो गुनगुनी धूप यादगार बन गई। आज उस घटना को सोलह बरस बीत गये पर वो मानस-पटल पर आज जीवंत है।